मैं तुमको भूल नहीं पाता December 16, 2008
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यह कविता मेरे मन में बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध रचना ‘तब मैं तुम्हे भूल जाता हूँ‘ पढ़ते हुए एक प्रतिक्रिया के रूप में जन्मी थी. यूँ मेरी हैसियत तो नही, पर इसे मैं बाबा को ही समर्पित करना चाहूँगा.
हर्षित होकर वर्षा ऋतु का
अभिनंदन करते वृक्ष सघन,
काले मेघों का जब प्यासी
धरती करती है आवाहन ।
श्रावण की नीरव रजनी में,
रह-रह कर जब धीमे-धीमे
पपीहा दारूण स्वर में गाता,
मैं तुमको भूल नहीं पाता ॥
वह अतुल रूप, वह श्याम वर्ण,
मुख पर अव्यवस्थित केश सघन,
वह कृत्रिम क्रोध से भरी हँसी,
पर भेद खोलते धृष्ट नयन ।
कोमल कपोल, रक्ताभ अधर,
कोकिल समान वह सुमधुर स्वर,
यह चित्र कभी मन में आता,
फिर तुमको भूल नहीं पाता ॥
वैसे तो तुम्हे भुलाने के
जाने कितने ही किये यत्न,
पर तुमसे ध्यान हटा पाने के
व्यर्थ गये सारे प्रयत्न ।
है याद तुम्हारी आती जब,
संकल्प धरे रह जाते सब,
मैं अपने पर ही झुँझलाता,
अब तुमको भूल नहीं पाता ॥
मैं तुमको चाहा करता हूँ… April 23, 2007
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तुम्हे पा लूँ, ऐसी चाह नहीं,
चाहूँ भी तो कोई राह नहीं,
बेमक़सद, बेमतलब यूँ ही
मैं तुमको सोचा करता हूँ।
ग़ज़लों की उन्ही किताबों में,
उन सूखे हुए गुलाबों में,
जागी आँखों के ख़्वाबों में
मैं तुमको देखा करता हूँ।
जब साँसें बोझिल होती हैं,
धुंधली हर मंज़िल होती है,
जब दुनिया क़ातिल होती है,
मैं तुमको ढूंढा करता हूँ।
यूँ मुझे नियति पर नहीं यक़ीँ,
कोइ ईश्वर मेरा पूज्य नहीं,
पर ऐसा कुछ है अगर कहीं,
मैं तुमको मांगा करता हूँ।
ये रिश्ता तुम पर भार न हो,
शायद तुमको स्वीकार न हो,
मुझे कहने का अधिकार न हो,
(पर) मैं तुमको ‘अपना’ कहता हूँ।
मेरा मन April 23, 2007
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मेरा मन
अनुभवहीन
होने को चिर आनंद में विलीन
उत्सुक सदैव
किन्तु हा, दुर्दैव!
कठोर यथार्थ से अनभिज्ञ
व्यक्तिगत स्वार्थ से अपरिचित
कुटिल भावनाओं
अज्ञात आशंकाओं से
हर क्षण घिरा
फिर भी यह सरफिरा
उल्लासित
उत्साहित
एक समृद्ध अकिंचन
यह मेरा मन।
मेरी पहली कविता April 23, 2007
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1 comment so far
अनंत का विस्तार
अनंत से
अनंत तक,
अर्थात शून्य..
शून्य की सत्ता
अकल्प
अपरिमित,
अनंत..
स्वप्न हमारे
अनंत
अपरिमित,
होने को सभी संभावित,
किन्तु यथार्थ में
शून्य।