jump to navigation

एह्सास-ए-जाँ June 19, 2008

Posted by प्रवीण in कविता-ग़ज़ल.
Tags: , ,
4 comments

एह्सास-ए-जाँ लिखूँ, या सुरूर-ए-क़ज़ा लिखूँ ।
जो ख़ुद ही एक ग़ज़ल हो, अब मैं उसपे क्या लिखूँ॥

इरशाद पे जिसके क़लम उठाई है फिर से,
पहले तो मैं उस ख़ूबरू का शुक्रिया लिखूँ ॥

चाहे न कोइ भी हो, बस इक वो हों मेरे साथ,
फिर तो मैं एक नई तवारिख़-ए-जहाँ लिखूँ ॥

मेहताब से रुख़सार पे ज़ुल्फ़ों के ये बादल,
हट जाएँ ग़र तो उनकी हया का बयाँ लिखूँ॥

यूँ तुमपे तो बहुतों ने लिखा होगा बहुत कुछ,
क़ोशिश है कि हर लफ़्ज़ मैं सबसे जुदा लिखूँ॥

उसकी हर एक अदा से बिखरते हैं रंग सौ,
मुश्किल में हूँ, किस रंग में उसकी अदा लिखूँ॥

तय है कि जिसकी कोई सही इंतिहा नहीं,
फिर क्यों मैं ऎसी दास्ताँ की इब्तिदा लिखूँ?

जो कुछ भी दिल में आया, मैं लिखता चला गया,
अब तुम कहो तो फिर से मैं बाक़ायदा लिखूँ ॥

अधूरी ग़ज़ल February 12, 2008

Posted by प्रवीण in कविता-ग़ज़ल.
Tags: , ,
add a comment

माना कि तेरा जाना ऐ दोस्त, ज़रूरी है ।
कुछ देर ठहर जाओ, मेरी ग़ज़ल अधूरी है ॥

क्यों कोई मेरी ख़ातिर वक्त अपना करे ज़ाया,
मैं काश समझ पाता, सबकी मजबूरी है ॥

इतने न क़रीब आयें, कि दूर ही हो जायें,
इस से बेहतर बल्कि थोड़ी सी दूरी है ॥

क्या हर रोज़ ज़रूरी है April 24, 2007

Posted by प्रवीण in कविता-ग़ज़ल.
Tags: , ,
9 comments

शाम ढले घर वापस आना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
इज़्ज़त का परचम लहराना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?

वक्त का क्या है, वह तो अपनी धुन में चलता जाता है,
वक्त से अपनी दौड़ लगाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?

सबकुछ रौशन करने वाले बूढ़े तन्हा सूरज का
तारीक़ी में गुम हो जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

ख़ुद को सबसे बेहतर साबित करने की सबकी क़ोशिश,
यही क़वायद करते जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

तुम से जब मिलता हूं, कुछ मिसरे से ज़हन में आते हैं,
उनकी पूरी ग़ज़ल बनाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.